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माइक्रो फाइनेंस इंडस्ट्री नेटवर्क (MFIN) ने 31 मार्च, 2026 तक के उद्योग के आंकड़ों पर आधारित वित्त वर्ष 25-26 की चौथी तिमाही (Q4) के लिए 'माइक्रोमीटर' का 57वां संस्करण जारी किया

माइक्रो फाइनेंस इंडस्ट्री नेटवर्क (MFIN) ने 31 मार्च, 2026 तक के उद्योग के आंकड़ों पर आधारित वित्त वर्ष 25-26 की चौथी तिमाही (Q4) के लिए 'माइक्रोमीटर' का 57वां संस्करण जारी किया
  • भारतीय माइक्रोफाइनेंस उद्योग में सुधार के शुरुआती संकेत; पिछली तिमाही के मुकाबले 3% की बढ़त के साथ कुल इंडस्ट्री पोर्टफोलियो ₹3,25,174 करोड़ पहुंचा।

  • तिमाही वितरण (डिसबर्समेंट) पिछले सात तिमाहियों में सबसे अधिक ₹77,524 करोड़ रहा, जो कर्ज के प्रवाह में आई तेजी को दर्शाता है।

  • क्रेडिट क्वालिटी में बड़ा सुधार; 'पोर्टफोलियो एट रिस्क' (PAR 31-180 दिन) एक साल पहले के 6.3% से तेजी से घटकर 2.0% पर आया।

  • इंडस्ट्री पोर्टफोलियो में 44.2% हिस्सेदारी के साथ NBFC-MFIs सबसे बड़े ऋणदाता बने हुए हैं, जबकि बैंक 32.7% के साथ दूसरे स्थान पर हैं।

  • MFIN ने वित्त वर्ष 26-27 के लिए संभावित जोखिमों के प्रति किया आगाह; कम मानसून के अनुमान और पश्चिम एशिया संकट पर नजर रखने की सलाह दी।

नई दिल्ली : बैंकों, NBFC-MFIs, स्मॉल फाइनेंस बैंकों (SFBs) और NBFCs के प्रमुख उद्योग संघ तथा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा मान्यता प्राप्त देश के पहले स्व-नियामक संगठन (SRO), माइक्रो फाइनेंस इंडस्ट्री नेटवर्क (MFIN) ने 31 मार्च, 2026 तक के उद्योग के आंकड़ों पर आधारित अपनी प्रमुख त्रैमासिक रिपोर्ट 'माइक्रोमीटर' का 57वां संस्करण जारी कर दिया है। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि भारतीय माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र दो साल के कठिन दौर के बाद अब मजबूती से वापसी कर रहा है। लगातार सात तिमाहियों की गिरावट के बाद, इस तिमाही में पोर्टफोलियो में तिमाही-दर-तिमाही (QoQ) 3% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे कुल उद्योग पोर्टफोलियो ₹3,25,174 करोड़ पर पहुंच गया है।

पोर्टफोलियो में आई इस तेजी को ₹77,524 करोड़ के मजबूत त्रैमासिक वितरण (डिसबर्समेंट) से समर्थन मिला है। हालांकि यह आंकड़ा वित्त वर्ष 23-24 की चौथी तिमाही के उच्चतम स्तर से कम है, लेकिन पिछले सात तिमाहियों में यह सबसे अधिक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कर्ज की गुणवत्ता (क्रेडिट क्वालिटी) में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और यह मार्च 2024 से पहले के स्तर पर लौट आई है। 31 मार्च, 2026 तक PAR 31-90 दिन 0.8% और PAR 91-180 दिन 1.2% दर्ज किया गया। पिछले आठ तिमाहियों से इन दोनों मानकों में लगातार सुधार देखा जा रहा है।

रिपोर्ट के नए आयाम और संस्थागत ढांचा

क्वालीफाइंग एसेट मानदंडों पर नियामक लचीलेपन के बाद एमएफआई (MFIs) के बदलते बिजनेस मॉडल को देखते हुए इस 57वें संस्करण में दो महत्वपूर्ण विश्लेषण जोड़े गए हैं:

  • पोर्टफोलियो विविधीकरण विश्लेषण: इसके तहत विभिन्न आकारों की NBFC-MFIs के माइक्रोफाइनेंस और गैर-माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो के प्रदर्शन के साथ-साथ उनके ऑन- एंड ऑफ-बैलेंस शीट एक्सपोजर की विस्तृत ट्रैकिंग की जा रही है।

  • अन्य विनियमित संस्थाएं (ORE): पिछले संस्करण में शुरू किए गए इस खंड को और विस्तृत किया गया है, जो एमफिन के सदस्य बैंकों, एसएफबी और एनबीएफसी की माइक्रोफाइनेंस गतिविधियों का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

संस्थागत हिस्सेदारी की बात करें तो, NBFC-MFIs कुल उद्योग पोर्टफोलियो में 44.2% हिस्सेदारी के साथ सूक्ष्म ऋण (माइक्रोक्रेडिट) के सबसे बड़े प्रदाता बने हुए हैं। इसके बाद बैंकों की हिस्सेदारी 32.7% है, जबकि शेष हिस्सेदारी स्मॉल फाइनेंस बैंकों और एनबीएफसी की है। सालाना आधार पर (YoY) सभी संस्थाओं के बकाया पोर्टफोलियो में गिरावट देखी गई, जिसमें सबसे अधिक गिरावट बैंकों में (-30%) और सबसे कम गिरावट NBFC-MFIs में (-2.7%) दर्ज की गई।

समीक्षाधीन वर्ष के दौरान छोटे एमएफआई के लिए फंड जुटाने की चुनौती काफी स्पष्ट देखी गई। अखिल भारतीय वित्तीय संस्थानों (AIFIs) द्वारा छोटे प्लेयर्स से दूरी बनाए रखने के कारण, बैंकों, एनबीएफसी और ईसीबी (ECBs) ही उनके लिए देनदारियों के प्राथमिक स्रोत रहे, हालांकि यह भी पिछले वर्षों की तुलना में कम था।

क्षेत्रीय स्थिति और भविष्य का दृष्टिकोण

भौगोलिक दृष्टि से, माइक्रोफाइनेंस का परिचालन अब देश के 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और 721 जिलों में फैल चुका है। कम सेवा वाले क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित रहने के कारण पूर्वी क्षेत्र (Eastern Region) 36.6% हिस्सेदारी के साथ शीर्ष पर बना हुआ है। पोर्टफोलियो हिस्सेदारी के मामले में शीर्ष तीन राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु हैं, और देश के शीर्ष दस राज्य कुल पोर्टफोलियो में लगभग 80% की हिस्सेदारी रखते हैं।

उद्योग के इस सकारात्मक बदलाव पर टिप्पणी करते हुए एमफिन (MFIN) के सीईओ और निदेशक डॉ. आलोक मिश्रा ने कहा:

"हम अब यह कह सकते हैं कि पिछले 2 कठिन वर्षों के बावजूद, उद्योग इस चुनौतीपूर्ण दौर से बाहर निकल रहा है। पोर्टफोलियो में बढ़ोतरी और पोर्टफोलियो एट रिस्क (PAR 31-180 दिन) का मार्च 2026 तक घटकर 2.0% पर आना इसका सीधा प्रमाण है, जो एक साल पहले 6.3% था। भारत सरकार की CGSMFI 2.0 योजना एक ऐसा महत्वपूर्ण नीतिगत कदम है जो इस सुधार को और मजबूत करेगा। हाल ही में इस योजना को अगस्त 2026 तक बढ़ाए जाने से इसके उपयोग के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। यह क्षेत्र सरकार का आभारी है, और उद्योग ने भी एमफिन गाइडलाइंस (MFIN Guardrails) के आधार पर अपने प्रदर्शन में सुधार करके अपनी भूमिका निभाई है; अब समय आ गया है कि बैंक आगे आएं और वित्तीय समावेशन (फाइनेंशियल इंक्लूजन) के इस उद्देश्य का सक्रिय रूप से समर्थन करें।"

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जहां ये सकारात्मक कारक उद्योग के लिए अच्छे संकेत हैं, वहीं एमफिन ने संस्थाओं को कुछ बाहरी जोखिमों के प्रति सतर्क रहने की सलाह भी दी है। संस्थान ने कहा है कि उद्योग को औसत से कम मानसून के अनुमान और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के संभावित प्रभावों को ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि ये कारक ग्रामीण आजीविका और उनकी ऋण अदायगी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

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