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भारतीय रिज़र्व बैंक ने वृद्धि और महंगाई के दृष्टिकोण में सुधार के बीच दरों को रखा स्थिर

भारतीय रिज़र्व बैंक ने वृद्धि और महंगाई के दृष्टिकोण में सुधार के बीच दरों को रखा स्थिर

-श्री संजय चतुर्वेदी, चीफ ट्रेजरी ऑफिसर, नामदेव फिनवेस्ट लिमिटेड

 

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने आज जून की पॉलिसी की तुलना में, आज रेपो दर को 5.25% पर स्थिर रखा और अपना तटस्थ (न्यूट्रल) रुख बरकरार रखा, लेकिन वित्त वर्ष ‘27 के वृहत-आर्थिक दृष्टिकोण में मामूली सुधार किया। वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि का अनुमान अब 6.7% है, जो पहले 6.6% था, जबकि महंगाई का अनुमान 5.0% है, जो पहले ज़ाहिर 5.1% के अनुमान से थोड़ा कम है। इन बदलावों से स्पष्ट है कि घरेलू मांग और वित्तीय हालात वाह्य दबावों को बिना किसी तत्काल नीतिगत प्रतिक्रिया के झेल सकते हैं। भूराजनैतिक तनाव, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति –श्रृंखला में रुकावट और अल-नीनो से जुड़ी अनिश्चितता के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी हुई है। मज़बूत निजी खपत, निवेश की जारी गति और सेवा क्षेत्र की बेहतर गतिविधियां में वृद्धि के दृष्टिकोण का समर्थन करती हैं, हालांकि इनपुट और लॉजिस्टिक्स की अधिक लागत कुछ विशिष्ट क्षेत्रों पर असर डाल सकती है। बैंकिंग प्रणाली में तरलता की अच्छी स्थति और क्रेडिट की लगातार मांग से ट्रांसमिशन में मदद मिलनी चाहिए, जबकि संभावित एफसीएनआर (बी) प्रवाह से विदेशी मुद्रा फंडिंग को मज़बूती मिल सकती है और बाज़ार तरलता पर दबाव कम हो सकता है। दरों में बदलाव न होने से ऋण लेने वालों और व्यवसायों के लिए भी निकट भविष्य के लिए अधिक निश्चितता हासिल होगी। हालांकि, आरबीआई के सतर्क बने रहने की संभावना है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों, मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव, खाद्य मुद्रास्फीति और वैश्विक स्तर पर मौद्रिक नीति के सख्त होने से जोखिमों का संतुलन बदल सकता है।

 

कुल मिलाकर, पिछली नीति की तुलना में इस बार का दृष्टिकोण अधिक आशावादी है, हालांकि आरबीआई ने सतर्क रुख बनाए रखा है, वृद्धि की उम्मीद बढ़ी है, महंगाई की चिंता थोड़ी कम हुई है, और केंद्रीय बैंक ने हालात बदलने पर पहल करने के लिए लचीलापन बनाए रखा है। नामदेव फिनवेस्ट लिमिटेड, पश्चिम एशिया संघर्ष और भारतीय अर्थव्यवस्था पर अल-नीनो के असर के संभावित जोखिमों के मद्देनज़र अनिश्चित दृष्टिकोण के बीच अभी भी सतर्क रुख अपनाए हुए है।

 

एमएसएमई क्षेत्र को, पिछले दो साल नियामकीय सख्ती और उच्च जोखिम भार (रिस्क-वेट) आवश्यकताओं का सामना करना पड़ा है, जिससे अंडरराइटिंग मानक मजबूत हुए हैं और पूरे उद्योग में ऋण अनुशासन में सुधार हुआ है। परिसंपत्ति गुणवत्ता बेहतर हुई है, लीवरेज का स्तर कम हुआ है और ऋण की मांग अच्छी बनी हुई है। हमारा मानना ​​है कि इस क्षेत्र ने काफी हद तक तनाव चक्र (स्ट्रेस साइकल) के चरम को पार कर लिया है और बेहतर क्रेडिट गुणवत्ता, कम ओवर-लीवरेज और ऋण लेने वालों की मज़बूत क्षमता के साथ अधिक वहनीय वृद्धि के दौर में प्रवेश कर रहा है। एमएसएमई ऋण बकाया सालाना आधार पर 16% बढ़कर ₹67.6 लाख करोड़ पर पहुंच गया, जबकि पिछले एक साल में सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (जीएनपीए) में अनुपात में लगभग एक प्रतिशत का सुधार हुआ है ऐसे माहौल में, जिन एनबीएफसी की ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में अच्छी मौजूदगी है और जिनकी जोखिम आकलन की क्षमता मज़बूत है, वे समझदारी से वृद्धि दर्ज करते हुए उन एमएसएमई और माइक्रोफाइनेंस उधारकर्ताओं की मदद करने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में होंगी, जिनकी क्रेडिट तक पहुंच कम है। हमें उम्मीद है कि बेहतर होती परिसंपत्ति गुणवत्ता, फंडिंग की उपलब्धता और उधारकर्ताओं की मज़बूत आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र इनकी बाज़ार ऋण की मांग को बढ़ाने में मुख्य भूमिका बनी रहेगी।

 

स्थिर मौद्रिक नीति के माहौल से फंडिंग की लागत और ब्याज दरों के बारे में भी बेहतर अंदाज़ा मिलता है, जिससे एनबीएफसी अधिक असरदार तरीके से बैलेंस शीट की योजना और समझदारी से तरलता प्रबंधन कर पाती हैं। आने वाले समय में वैश्विक अनिश्चितताओं की सतर्क नज़र होगी, लेकिन मौजूदा मौद्रिक नीति का रुख ज़िम्मेदार ऋण विस्तार को समर्थन प्रदान करने और भारत की दीर्घकालिक आर्थिक विकास की रफ्तार को बरकरार रखने के लिए आवश्यक स्थिरता और विश्वास प्रदान करता है।

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