उद्योग ने वैश्विक अस्थिरता के बीच अनुमानित सब्सिडी सहायता, संतुलित पोषण और निवेश सक्षमता की मांग की
एफएआई ने वैश्विक इनपुट कीमतों में अस्थिरता और आयात निर्भरता के बीच उर्वरक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बजट प्राथमिकताओं को रेखांकित किया है।
उद्योग ने अनुमानित सब्सिडी, संतुलित पोषण सुधार और घरेलू फॉस्फेटिक क्षमता के लिए समर्थन मांगा है।
लागत दक्षता और विनिर्माण व्यवहार्यता में सुधार के लिए टैक्स, जीएसटी और सर्कुलर इकोनॉमी उपायों पर जोर दिया गया है।
नई दिल्ली : केंद्रीय बजट 2026-27 से पहले, 'द फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया' (FAI) ने सरकार से भारत की उर्वरक सुरक्षा को मजबूत करने, संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग को बढ़ावा देने और 'आत्मनिर्भर भारत' के दृष्टिकोण के अनुरूप घरेलू विनिर्माण का समर्थन करने के लिए लक्षित नीतिगत और राजकोषीय उपायों पर विचार करने का आग्रह किया है।
एफएआई ने उल्लेख किया कि 2024-25 में भारत का 358 मिलियन टन का रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन कृषि विकास को बनाए रखने में उर्वरकों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। इस गति को बनाए रखने के लिए, उद्योग ने पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार, आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करने और बढ़ती इनपुट लागतों व जलवायु परिवर्तनशीलता के बीच एक स्थिर एवं अनुमानित नीतिगत वातावरण सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया है।
उद्योग ने रेखांकित किया कि रॉक फॉस्फेट, फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया, पोटाश और सल्फर जैसे प्रमुख उर्वरक कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में निरंतर अस्थिरता (जो भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण है) ने उत्पादन लागत और आयात निर्भरता को बढ़ा दिया है। हालांकि मोरक्को, सऊदी अरब और कतर के साथ आपूर्ति व्यवस्था जैसे समय पर सरकारी हस्तक्षेपों ने उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद की है, लेकिन वैश्विक बाजारों में निरंतर अनिश्चितता ने निवेश की धारणा को प्रभावित किया है।
इन चुनौतियों के संचयी प्रभाव को देखते हुए, डॉ. सुरेश कुमार चौधरी, महानिदेशक, द फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कहा कि निरंतर उर्वरक सुरक्षा किसानों के लिए सामर्थ्य (affordability), निर्माताओं के लिए वित्तीय व्यवहार्यता और निवेश की निरंतरता के बीच संतुलन बनाए रखने पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि कुशल और टिकाऊ उर्वरक उपयोग सुनिश्चित करने के लिए अनुमानित सब्सिडी ढांचा, तर्कसंगत कराधान और समय पर नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं।
एफएआई ने 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' के उद्देश्यों के अनुरूप स्वदेशी फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरक क्षमता, बैकवर्ड इंटीग्रेशन परियोजनाओं और रणनीतिक विदेशी सोर्सिंग में नए निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन की आवश्यकता पर बल दिया है।
कराधान के मोर्चे पर मांगें: उर्वरक उद्योग ने प्रमुख कच्चे माल को प्रभावित करने वाले सीमा शुल्क (Customs Duty) और जीएसटी प्रावधानों के युक्तिकरण की मांग की है। इसमें शामिल हैं:
अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड, सल्फ्यूरिक एसिड, रॉक फॉस्फेट और सल्फर जैसे इनपुट पर बेसिक कस्टम ड्यूटी से छूट या कमी।
कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (AIDC) से राहत।
'इनवर्टेड जीएसटी ड्यूटी स्ट्रक्चर' (उल्टा जीएसटी ढांचा) से उत्पन्न समस्याओं का समाधान, जिससे अप्रयुक्त इनपुट टैक्स क्रेडिट जमा हो जाता है।
संतुलित उर्वरक उपयोग और सुधार: एफएआई ने मृदा स्वास्थ्य (Soil Health) की रक्षा के लिए संतुलित उर्वरीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। यह नोट किया गया कि यूरिया और पीएंडके (P&K) उर्वरकों की कीमतों में असमानता के कारण एन:पी:के (N:P:K) खपत अनुपात असंतुलित हो गया है। यूरिया को 'पोषक तत्व आधारित सब्सिडी' (NBS) ढांचे के तहत लाने के साथ-साथ बायो-फर्टिलाइजर और पीएम-प्रणाम (PM-PRANAM) जैसी पहलों से मूल्य विकृतियों को ठीक करने में मदद मिलेगी।
उर्वरक उद्योग ने विश्वास व्यक्त किया कि केंद्रीय बजट 2026-27 में इन सुझावों पर समय पर विचार करने से लागत दक्षता और वित्तीय व्यवहार्यता में सुधार होगा, घरेलू विनिर्माण मजबूत होगा और भारतीय किसानों को उर्वरकों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित होगी।