सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ईसाई आर्मी अधिकारी की अपील खारिज करते हुए उसकी बर्खास्तगी को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि ग़ुरुद्वारे (या मंदिर के गर्भगृह) में रेजीमेंटल धार्मिक समारोह के तहत प्रवेश से इनकार करना “गंभीर अनुशासनहीनता” है।
क्या हुआ था
अधिकारी सैमुअल कमलेसन, जो 3rd कैवेलरी रेजीमेंट में लेफ्टिनेंट थे, ने एक सीधे आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया था। उनसे कहा गया था कि वे ग़ुरुद्वारे/मंदिर के गर्भगृह में जाकर पूजा में हिस्सा लें। कमलेसन ने कहा कि उनकी ईसाई धार्मिक मान्यता इसकी अनुमति नहीं देती।
इस इनकार के बाद सेना ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की और 2021 में उन्हें सेवामुक्त कर दिया। सेना का कहना था कि उनका व्यवहार सैन्य अनुशासन को तोड़ता है और यूनिट की एकता को नुकसान पहुंचाता है।
कोर्ट की राय और फैसला
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने कहा:
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एक वैध आदेश का पालन न करना, खासकर सेना जैसी धर्मनिरपेक्ष और विविध संस्था में, अनुशासन और एकता को कमजोर करता है।
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चाहे अधिकारी का रिकॉर्ड कुछ मामलों में ठीक रहा हो, लेकिन आदेश मानने से इनकार उन्हें “आर्मी के लिए अनुपयुक्त” बनाता है।
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कोर्ट ने उन्हें “झगड़ालू व्यक्ति” (cantankerous man) बताया और कहा कि ऐसा रवैया सेना में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
पीठ ने यह भी कहा कि जब उनके अपने पादरी ने कहा था कि ग़ुरुद्वारे में प्रवेश करने से उनके धर्म का उल्लंघन नहीं होगा, फिर भी उन्होंने इनकार किया—इससे उनकी दलील और कमजोर हो गई।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कमलेसन की याचिका खारिज कर दी और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उनकी बर्खास्तगी सही ठहराई गई थी।
व्यापक महत्व
कोर्ट के अनुसार, यह फैसला स्पष्ट करता है कि भारतीय सेना जैसे बहु-धार्मिक और बहुसांस्कृतिक वातावरण में व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताएं वैध सैन्य आदेशों से ऊपर नहीं हो सकतीं।
ऐसे आदेश सैनिकों के बीच अनुशासन, एकता और विभिन्न धर्मों के प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए आवश्यक होते हैं।
फैसला यह भी दोहराता है कि रेजीमेंटल परंपराओं और अनुष्ठानों में हिस्सा लेना सैनिकों के कर्तव्यों का हिस्सा है—चाहे उनकी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता कुछ भी हो—ताकि यूनिट की भावना, मनोबल और सामूहिकता बनी रहे।