- मार्च 2017 में 35% के
मुकाबले मार्च 2026 तक कर्ज़ लेने के योग्य भारतीयों में 74% लोग कम
से कम एक बार औपचारिक कर्ज़ ले चुके हैं। वहीं, मार्च 2018 से
मार्च 2026 के बीच क्रेडिट मॉनिटरिंग करने वालों की
हिस्सेदारी 1% से बढ़कर 35% हो गई।
- देश में
ऋण का दायरा बढ़ाने में महिलाओं, युवा उधारकर्ताओं और गैर-महानगरीय क्षेत्रों की
बड़ी भूमिका रही है। इस दौरान उत्तर प्रदेश, मध्य
प्रदेश और बिहार में क्रेडिट ग्रोथ पश्चिम और दक्षिण भारत के पारंपरिक मजबूत
राज्यों से भी तेज़ रही।
- अध्ययन
के अनुसार, औपचारिक ऋण व्यवस्था से अभी भी बड़ी संख्या में
नए उपभोक्ताओं (एनटीसी) और नए कारोबारी संस्थानों (एनटीसी कमर्शियल
एंटाइटीज़) को जोड़ने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।
मुंबई : देश में औपचारिक कर्ज़ (फॉर्मल क्रेडिट) तक
लोगों की पहुंच पिछले नौ वर्षों में तेज़ी से बढ़ी है। ट्रांसयूनियन सिबिल की नई
रिपोर्ट 'अनलॉकिंग एक्सेस: जर्नी टू क्रेडिट एक्सपैंशन इन इंडिया' के
अनुसार, मार्च 2017 से मार्च 2026 के बीच उत्तर प्रदेश, मध्य
प्रदेश और बिहार में कर्ज़ लेने वालों की संख्या पारंपरिक रूप से मजबूत माने जाने
वाले पश्चिम और दक्षिण भारत के राज्यों की तुलना में अधिक तेज़ी से बढ़ी है। इस
दौरान महिलाओं, युवाओं और गैर-महानगरीय क्षेत्रों की भागीदारी
में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।
रिपोर्ट
के मुताबिक, देश में क्रेडिट के पात्र लोगों (क्रेडिट-एलिजिबल[1] पॉपुलेशन) की संख्या 2017 में 79 करोड़
से बढ़कर 2026 में 89 करोड़ हो गई। इनमें कम से कम एक बार औपचारिक कर्ज़ (एवर-क्रेडिटेड[2]) लेने वाले लोगों की
हिस्सेदारी 35% से बढ़कर 74% पहुंच गई, जो देश में औपचारिक वित्तीय व्यवस्था की बढ़ती
पहुंच को दर्शाती है।
रिपोर्ट
के अनुसार, कर्ज़ लेने के योग्य[3] आबादी में सक्रिय
कर्ज़धारकों (क्रेडिट-एक्टिव कंज्यूमर्स) की हिस्सेदारी भी मार्च 2017 के 11% से
बढ़कर मार्च 2026 में 28% हो गई। हालांकि, इस अवधि में सक्रिय
कर्ज़धारकों की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) मार्च 2017-मार्च 2019 के 14% से
घटकर मार्च 2024-मार्च 2026 के दौरान 9% रह गई। इसी तरह, पहली
बार औपचारिक कर्ज़ लेने वाले उपभोक्ताओं (एनटीसी) की हिस्सेदारी भी मार्च 2017 तिमाही
के 32% से घटकर मार्च 2026 तिमाही में 13% रह गई। रिपोर्ट के
अनुसार, इससे यह संकेत मिलता है कि मौजूदा कर्ज़धारकों के साथ जुड़ाव बढ़ाने के
साथ-साथ नए उपभोक्ताओं को भी औपचारिक कर्ज़ व्यवस्था से जोड़ने की पर्याप्त
संभावनाएं मौजूद हैं।
चार्ट 1 :
भारत में खुदरा कर्ज़ तक पहुंच
: मार्च 2017 बनाम मार्च
2026
(2017 का डेटा मार्च 2017 के कर्ज़धारक आधार पर आधारित है, जबकि 2026 का डेटा मार्च 2026 के कर्ज़धारक आधार पर आधारित है।)
ट्रांसयूनियन सिबिल के एमडी एवं सीईओ भावेश जैन
ने कहा,
"भारत के क्रेडिट इकोसिस्टम के लिए पिछला दशक बेहद अहम
रहा है। वर्ष 2016-17 के दौरान नोटबंदी, जीएसटी लागू होने और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस
(यूपीआई) को तेजी से अपनाए जाने जैसे बड़े बदलाव हुए। इसके बाद के वर्षों में
नियामकों, बैंकों, वित्तीय संस्थानों, एनबीएफसी, फिनटेक कंपनियों, क्रेडिट सूचना कंपनियों, तकनीकी प्रगति और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ने मिलकर लोगों के लिए
औपचारिक कर्ज़ तक पहुंच आसान बनाई। कोविड-19 महामारी के दौरान डिजिटल माध्यमों का उपयोग भी तेजी से बढ़ा। ऐसा माना जाता
है कि इन सभी बदलावों ने न केवल वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया, बल्कि लोगों के लिए कर्ज़ तक पहुंच आसान की और
ऋणदाताओं को अधिक सटीक एवं समय पर कर्ज़ संबंधी निर्णय लेने में भी मदद की।"
कर्ज़ पोर्टफोलियो में बढ़ी उपभोग और कारोबारी कर्ज़ की
हिस्सेदारी
रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज़धारकों के क्रेडिट पोर्टफोलियो की संरचना में
उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। उपभोक्ता अब उपभोग संबंधी और कारोबार के
उद्देश्य से लिए जाने वाले कर्ज़ को पहले के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे उनके कर्ज़ लेने के रुझान
में बदलाव साफ़ दिखाई देता है।
पर्सनल
लोन, क्रेडिट कार्ड और कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन जैसे
उपभोग संबंधी कर्ज़[4] सबसे लोकप्रिय श्रेणी
के रूप में उभरे हैं। मार्च 2017
में 34% सक्रिय कर्ज़धारकों के पास इस श्रेणी के उत्पाद थे, जो
मार्च 2026 तक बढ़कर 51% हो गए। वहीं, इन
उत्पादों का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या भी नौ वर्षों में चार गुना
हो गई।
वहीं, कारोबार
से जुड़े कर्ज़[5] में सबसे तेज़
बढ़ोतरी दर्ज की गई। मार्च 2017
में जहां 3% सक्रिय कर्ज़धारकों ने इस श्रेणी के कर्ज़ ले रखे थे, वहीं
मार्च 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 9% हो गया। इस अवधि में ऐसे कर्ज़ लेने वालों की संख्या 10 गुना
बढ़ी, जो अध्ययन में शामिल सभी श्रेणियों में सबसे
तेज़ वृद्धि रही। इसके मुकाबले गोल्ड लोन लेने वालों की हिस्सेदारी 19% से बढ़कर 22% हुई, जबकि वाहन ऋण और मॉर्गेज प्रोडक्ट्स की वृद्धि
लगभग स्थिर रही।
चार्ट 2: कर्ज़ उत्पादों की बदलती पसंद
: मार्च 2017 बनाम मार्च 2026
(2017 के आंकड़े मार्च 2017 के सक्रिय कर्ज़धारकों (क्रेडिट-एक्टिव
बॉरोअर बेस) के आधार पर तैयार किए गए हैं, जबकि
2026 के आंकड़े मार्च 2026 के सक्रिय
कर्ज़धारकों के आधार पर हैं।)
श्री जैन ने आगे कहा, "कर्ज़ लेने के
रुझानों में आए बदलाव से साफ है कि आज लोग पहले की तुलना में संपत्ति खरीदने के
बजाय अपनी जीवनशैली से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए कर्ज़ का अधिक इस्तेमाल
कर रहे हैं। उपभोग संबंधी कर्ज़ों ने देश में औपचारिक कर्ज़ की पहुंच को व्यापक
बनाने में अहम भूमिका निभाई है। वहीं, व्यक्तिगत स्तर पर
कारोबार के उद्देश्य से लिए जा रहे कर्ज़ों में तेज़ बढ़ोतरी यह दिखाती है कि अब
अधिक लोग उद्यम शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने के लिए भी कर्ज़ का सहारा ले रहे हैं।
ऐसे में ऋणदाताओं के पास यह अवसर है कि वे व्यक्तिगत उद्यमियों और उनके कारोबार, दोनों को साथ लेकर अधिक समग्र और प्रभावी ऋण रणनीति
तैयार करें।"
महिलाओं, युवाओं और ग्रामीण
क्षेत्रों की बढ़ी भागीदारी से बढ़ा कर्ज़ का दायरा
औपचारिक कर्ज़ तक बढ़ती पहुंच के साथ देश के सक्रिय
कर्ज़धारकों की संरचना में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। मार्च 2017 में सक्रिय कर्ज़धारकों
में महिलाओं की हिस्सेदारी 22% थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 30% हो गई। इसी अवधि में युवा कर्ज़धारकों की हिस्सेदारी 33% से बढ़कर 39% पहुंच गई। वहीं, अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों
(एसयूआरयू) से आने वाले उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी 53% से बढ़कर 63% हो गई।
इन
तेजी से बढ़ते वर्गों में अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के युवा कर्ज़धारकों की
हिस्सेदारी सबसे अधिक बढ़ी। मार्च 2017
में यह 47% थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 61% हो गई। वहीं, महिलाओं
में पांच वर्ष से अधिक का खुदरा कर्ज़ अनुभव रखने वालों की हिस्सेदारी 29% से बढ़कर 43% पहुंच गई। अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की
सक्रिय महिला कर्ज़धारकों की हिस्सेदारी भी मार्च 2017 के 57% से बढ़कर मार्च 2026 में 64% हो गई।
रिपोर्ट
के अनुसार, जैसे-जैसे औपचारिक कर्ज़ व्यवस्था का दायरा बढ़ा, वैसे-वैसे
अधिक कर्ज़ का बोझ उठाने वाले उधारकर्ताओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी। वित्त वर्ष 2017 में नए कर्ज़ वितरण में इनकी हिस्सेदारी 5% थी, जो
बढ़कर वित्त वर्ष 2024
में 18% हो गई। हालांकि, वित्त वर्ष 2026 तक यह घटकर 15% पर आ गई। अध्ययन के अनुसार, पिछले दो वर्षों में उद्योग द्वारा उठाए गए
कदमों से इस बढ़ोतरी पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया
है कि अधिक कर्ज़ का बोझ मुख्य रूप से युवा कर्ज़धारकों जैसे तेजी से बढ़ते
उपभोक्ता वर्गों में देखने को मिला।
पिछले
नौ वर्षों में कर्ज़धारकों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ लोगों में क्रेडिट के प्रति
जागरूकता भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। मार्च 2018 में
जहां क्रेडिट मॉनिटरिंग करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या लगभग नगण्य थी, वहीं
मार्च 2026 तक सक्रिय कर्ज़धारकों में ऐसे उपभोक्ताओं की
हिस्सेदारी बढ़कर 35% हो गई। इसी दौरान लंबे
समय से औपचारिक कर्ज़ का उपयोग कर रहे अनुभवी कर्ज़धारकों (क्रेडिट-एक्सपीरियंस्ड
उपभोक्ताओं) की हिस्सेदारी भी 38% से बढ़कर 54% पहुंच गई।
अध्ययन
के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक देश के क्रेडिट विस्तार के भौगोलिक
स्वरूप में आया बदलाव है। राज्यों के आधार पर किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि
वर्ष 2017 से 2026
के बीच उत्तर और मध्य
भारत में क्रेडिट ग्रोथ, पश्चिम और दक्षिण भारत की तुलना में अधिक तेज़
रही। महाराष्ट्र और तमिलनाडु अब भी देश के सबसे बड़े क्रेडिट बाजारों में शामिल
हैं, हालांकि उनकी हिस्सेदारी क्रमशः 12% से घटकर 10% और 11% से
घटकर 9% रह गई। दूसरी ओर, उत्तर
प्रदेश की हिस्सेदारी 8% से बढ़कर 11%, मध्य प्रदेश की 4% से बढ़कर 6%, बिहार
की 3% से बढ़कर 5% और पश्चिम बंगाल की 4% से बढ़कर 5% हो गई।
चार्ट 3: भारत के क्रेडिट इन्क्लूज़न मैप में बदलाव
Chart 3: Re-writing
of India’s Credit Inclusion Map
(2017 का डेटा मार्च 2017 के सक्रिय कर्ज़धारक आधार पर आधारित है, जबकि 2026 का डेटा मार्च 2026 के सक्रिय कर्ज़धारक आधार पर आधारित है।)
भावेश जैन ने कहा, "पिछले एक दशक में
भारत में क्रेडिट ग्रोथ को गति देने में दो प्रमुख कारकों की अहम भूमिका रही है:
विभिन्न सामाजिक और भौगोलिक वर्गों की बढ़ती भागीदारी तथा क्रेडिट के प्रति बढ़ी
जागरूकता। पहले कारक ने नए वर्गों को औपचारिक कर्ज़ व्यवस्था से जोड़कर
कर्ज़धारकों का आधार व्यापक बनाया, जबकि दूसरे कारक ने
लोगों को लंबे समय तक जिम्मेदारी से कर्ज़ का उपयोग करने और अपने जीवन के लक्ष्यों
को पूरा करने के लिए इसका बेहतर इस्तेमाल करने में मदद की। महिलाएं अब पहले के
मुकाबले वित्तीय रूप से अधिक जागरूक और सक्रिय हो रही हैं तथा वित्तीय समावेशन को आगे
बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। डिजिटलीकरण और क्रेडिट के प्रति बढ़ती
जागरूकता के कारण महिला कर्ज़धारकों में जिम्मेदार और परिपक्व कर्ज़ उपयोग का
रुझान भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवा कर्ज़धारकों के
बीच दोपहिया या अन्य वाहनों की तुलना में मोबाइल फोन के लिए कर्ज़ लेने की
प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है, क्योंकि यह पीढ़ी
मोबाइल फोन को केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि पढ़ाई, कामकाज और उत्पादकता बढ़ाने के एक महत्वपूर्ण उपकरण के
रूप में देखती है।"
भावेश जैन ने आगे कहा, "एक और महत्वपूर्ण
बात यह है कि भारत के राज्यों में क्रेडिट ग्रोथ का स्वरूप धीरे-धीरे लेकिन स्पष्ट
रूप से बदल रहा है। पश्चिम और दक्षिण भारत के पारंपरिक रूप से मजबूत क्रेडिट बाजार
आज भी अपनी स्थिति बनाए हुए हैं, लेकिन उत्तर और मध्य
भारत के राज्यों में औपचारिक कर्ज़ व्यवस्था में भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी
है। 'विकसित भारत' के लक्ष्य को हासिल
करने के लिए देशभर में क्रेडिट ग्रोथ का संतुलित विस्तार बेहद महत्वपूर्ण है। इसके
लिए ज़रूरी है कि अधिक से अधिक लोग अनौपचारिक कर्ज़ व्यवस्था से निकलकर औपचारिक
कर्ज़ व्यवस्था से जुड़ें।"
कारोबारी कर्ज़ के विस्तार से बढ़ीं विकास की संभावनाएं
रिपोर्ट के अनुसार, उपभोक्ता कर्ज़ के साथ-साथ कारोबारी कर्ज़ के क्षेत्र
में भी उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला है। मार्च 2021 में कर्ज़ लेने के योग्य
कारोबारी इकाइयों की संख्या 6.3 करोड़ थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 8.7 करोड़ हो गई। इसी अवधि में एकल स्वामित्व
(प्रोपराइटरशिप) और साझेदारी (पार्टनरशिप) आधारित कारोबारों की हिस्सेदारी 70% से बढ़कर 88% हो गई। वहीं, कम जोखिम वाली कारोबारी इकाइयों
की हिस्सेदारी 13% से बढ़कर 37% और लंबे समय से औपचारिक कर्ज़ का उपयोग[6] कर रही अनुभवी कारोबारी इकाइयों की हिस्सेदारी 30% से बढ़कर 40% हो गई।
हालांकि, मार्च
2021 तिमाही से मार्च 2026 तिमाही के बीच
कारोबारी कर्ज़ लेने वाली इकाइयों की हिस्सेदारी 50% से
घटकर 41% रह गई। इसी दौरान
सक्रिय कारोबारी कर्ज़धारकों की हिस्सेदारी 10% से घटकर 9% और पहली बार औपचारिक कर्ज़ लेने वाली कारोबारी इकाइयों (एनटीसी) की
हिस्सेदारी 60% से घटकर 39% हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े बताते हैं कि अभी भी बड़ी संख्या में
कर्ज़ लेने के योग्य कारोबारों तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमियों (एमएसएमई) को औपचारिक
कर्ज़ व्यवस्था से जोड़ने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।
भावेश जैन ने
आगे कहा, "कारोबारी कर्ज़ के
क्षेत्र में कई सकारात्मक संकेत देखने को मिले हैं। एकल स्वामित्व (प्रोपराइटरशिप)
और साझेदारी (पार्टनरशिप) आधारित कारोबारों की बढ़ती संख्या बताती है कि अब अधिक
लोग अपने व्यवसाय के लिए कर्ज़ ले रहे हैं। इससे जमीनी स्तर पर औपचारिक कर्ज़ की
पहुंच भी लगातार बढ़ रही है। वहीं, कम जोखिम वाली कारोबारी इकाइयों की संख्या में
वृद्धि यह दर्शाती है कि कर्ज़ गारंटी योजनाएं कर्ज़धारकों को सहयोग देने में
प्रभावी रही हैं। साथ ही, पिछले पांच वर्षों में एमएसएमई कर्ज़धारकों के
आधार में हुए बड़े विस्तार से यह भी स्पष्ट होता है कि खासकर पहली बार औपचारिक
कर्ज़ लेने वाली कारोबारी इकाइयों को कर्ज़ व्यवस्था से जोड़ने और मौजूदा
कर्ज़धारकों के साथ जुड़ाव को और मजबूत करने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद
हैं।"
[1] Credit-eligible is the
total adult population aged between 18 to 60 as of period end
[2] Ever-credited are
consumers who have ever availed a retail loan as of period end
[3] Credit-eligible is the total adult population aged
between 18 to 60 years as of period end based on population estimate from the
World Bank database.
[4] Consumption loans
include personal loans, credit card and consumer durable loans
[5] Business Oriented
refers to business loans given to individuals, construction equipment loan and
commercial vehicle loan
[6] Credit Experienced are
entities who have been in the commercial bureau for more than 4 years