मुंबई — एसबीआई रिसर्च की नवीनतम 'इकोव्रैप' रिपोर्ट के अनुसार, नई योजना के तहत विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) [FCNR(B)] जमाओं का संचयन अभूतपूर्व गति से बढ़ते हुए मात्र 45 दिनों में 2013 के $26 अरब के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया है। ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष द्वारा जारी इस रिपोर्ट में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 17 जुलाई 2026 तक $17.41 अरब के एफसीएनआर(बी) जमा, $1.97 अरब के ओवरसीज फॉरेन करेंसी बरोइंग (OFCB) और $1.34 अरब के एक्सटर्नल कमर्शियल बरोइंग (ECB) के साथ कुल आवक $20.72 अरब तक पहुंच गई थी। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने विदेशी-घरेलू रणनीतियों के बेहतर संयोजन के माध्यम से इस पूंजी जुटाने की अगुवाई की है। रिपोर्ट का अनुमान है कि 30 सितंबर 2026 को योजना समाप्त होने तक कुल एफसीएनआर(बी) जमा $65–70 अरब तक पहुंच सकता है, जिससे कुल पूंजी आवक $80–85 अरब हो जाएगी और वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत का भुगतान संतुलन (Balance of Payments) $50 अरब से अधिक के अधिशेष (सरप्लस) में बदल जाएगा। जमा की तुलना में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों (FCA) में धीमी वृद्धि पर स्पष्टीकरण देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंक इन जमाओं को एक तय समय सारिणी के अनुसार आरबीआई के साथ स्वैप करते हैं, जिससे यह आंकड़े आरबीआई के विदेशी मुद्रा भंडार में धीरे-धीरे प्रतिबिंबित हो रहे हैं।
दूसरी ओर, इतनी मजबूत पूंजी आवक के बावजूद पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की सतर्कता के कारण भारतीय रुपये में लगातार गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है। एसबीआई रिसर्च ने सेंसर्ड टोबिट मॉडल (Censored Tobit Model) के विश्लेषण के आधार पर बताया कि आरबीआई द्वारा रुपये की गिरावट रोकने के लिए रोजाना औसतन $1.4 करोड़ ($14 million) का हस्तक्षेप किया जा रहा है, जो $676 अरब के कुल विदेशी मुद्रा भंडार को देखते हुए बाजार में स्थिरता लाने और अस्थिरता को रोकने के लिए अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है। इसकी तुलना में 1997-98 के दौरान तत्कालीन आरबीआई गवर्नर बिमल जालान के कार्यकाल में औसतन $5.5 करोड़ ($55 million) प्रतिदिन का मजबूत हस्तक्षेप किया गया था, जिसने रुपये को स्थिर करने में सफलता पाई थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि FCNR(B) विंडो बंद होने से पहले रुपये में आक्रामक और पूर्ण हस्तक्षेप (Full-throated Intervention) की रणनीति अपनाना आवश्यक है ताकि रुपये में आ रही गिरावट को रोका जा सके।