पश्चिम-एशिया संकट ने देश में ईवी (EV) अपनाने और घरेलू ऊर्जा बदलाव की रफ्तार को बढ़ाया; 2030 तक 20% ईवी पैठ हासिल करने से आयात बिल में ₹1 लाख करोड़ की होगी बचत।
मुंबई — वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और जारी पश्चिम-एशिया संकट के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार अपनी मजबूती का प्रदर्शन कर रही है, क्योंकि देश तेजी से तेल पर अपनी निर्भरता को कम कर संरचनात्मक बदलाव की ओर बढ़ रहा है। एसबीआई रिसर्च (अंक संख्या 12, वित्त वर्ष 27) के नवीनतम संस्करण के अनुसार, भारत की तेल तीव्रता (जीडीपी के मुकाबले तेल खपत का अनुपात) वित्त वर्ष 14 के 1.4% से प्रभावी रूप से घटकर वित्त वर्ष 26 में जीडीपी का 0.7% रह गई है। इसके साथ ही, जीडीपी के मुकाबले कच्चे तेल का आयात वित्त वर्ष 14 की दूसरी तिमाही (Q2FY14) के 8.6% के उच्चतम स्तर से उल्लेखनीय रूप से गिरकर वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही (Q2FY26) में 3.1% पर आ गया है।
इस विस्तृत रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि फरवरी 2026 से शुरू हुए पश्चिम-एशिया संकट ने वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अस्थिरता को जरूर बढ़ाया है, लेकिन इसने अनजाने में घरेलू स्तर पर बदलाव के लिए एक उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) के रूप में कार्य किया है, जिससे देश भर में परिवहन और ऊर्जा प्राथमिकताओं में बदलाव आया है। 'बाई-पेरॉन मल्टीपल ब्रेकपॉइंट टेस्ट' के माध्यम से किए गए इकोनोमेट्रिक विश्लेषण से मार्च 2026 में एक स्पष्ट संरचनात्मक बदलाव (स्ट्रक्चरल ब्रेक) की पुष्टि होती है, जो ठीक उसी समय हुआ जब पश्चिम-एशिया संघर्ष बढ़ा था। यह दर्शाता है कि कैसे व्यापक आर्थिक झटके (मैक्रोइकोनॉमिक शॉक्स) भारत के आयात तंत्र में संरचनात्मक बदलाव ला रहे हैं।
घटती तेल निर्भरता के मुख्य चालक (की ड्राइवर्स):
कृषि क्षेत्र में बदलाव: पारंपरिक डीजल पंपों को सौर ऊर्जा संचालित सिंचाई पंपों से आक्रामक रूप से बदलने के कारण, कृषि क्षेत्र में हाई-स्पीड डीजल (HSD) की खपत वित्त वर्ष 25 में सीमित होकर महज 4.7% रह गई है।
व्यापक सार्वजनिक परिवहन (मास पब्लिक ट्रांजिट): भारत के मेट्रो नेटवर्क का साल 2014 के 248 किमी से तेजी से विस्तार होकर 29 शहरों में 1,143 किमी तक पहुंचना शहरी ईंधन निर्भरता को व्यवस्थित रूप से कम कर रहा है।
औद्योगिक हरित परिवर्तन (इंडस्ट्रियल ग्रीन शिफ्ट): भारत के उद्योग अब नवीकरणीय (रिन्यूएबल) ऊर्जा पर अधिक निर्भरता दिखा रहे हैं। जनवरी 2026 तक देश की कुल 521 गीगावाट (GW) की स्थापित उत्पादन क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी 40% (212 GW) हो चुकी है।
ईवी की बढ़ती रफ्तार (एक्सेलरेटेड ईवी मोमेंटम): युद्ध के बाद के उत्साह से प्रेरित होकर, प्योर ईवी (EV) पंजीकरण साल 2025 के औसतन 1.3 लाख प्रति माह से बढ़कर मार्च और जून 2026 के बीच 2.3 लाख प्रति माह पर पहुंच गया है। साल 2026 में कुल ईवी पंजीकरण के आराम से 25 लाख के आंकड़े को पार कर जाने का अनुमान है।
ई-ट्रक की धीमी रफ्तार और ईवी इकोसिस्टम इन्फ्रास्ट्रक्चर: अनुसंधान से पता चलता है कि यद्यपि भारत इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है, लेकिन बैटरी से चलने वाले भारी माल वाहनों (ई-ट्रक) की तैनाती अब भी असंतोषजनक है। जहां चीन में 2025 में बेचे गए हर चार ट्रकों में से एक ट्रक बिजली (इलेक्ट्रिसिटी) से चल रहा था, वहीं भारत अभी भी 'पीएम ई-ड्राइव' (PM E-DRIVE) जैसी शुरुआती योजनाओं पर काफी निर्भर है, जो 5,600 ई-ट्रकों को सहायता देने के लिए प्रति वाहन ₹9.6 लाख तक की अग्रिम खरीद सब्सिडी प्रदान करती है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर की सीमाएं भी तेज विस्तार की राह में बाधा बनी हुई हैं। दिसंबर 2025 तक भारत भर के कुल 29,151 चार्जिंग स्टेशनों में से केवल 30% में ही फास्ट चार्जर उपलब्ध हैं। इसने कई क्षेत्रों में चार्जिंग नेटवर्क पर भारी बोझ डाल दिया है, जिसमें उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रति चार्जिंग स्टेशन पर क्रमशः औसतन लगभग 182 और 194 ईवी आ रहे हैं।
भविष्य की राह के लिए रणनीतिक सिफारिशें: एसबीआई रिसर्च ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि साल 2030 तक 20% ईवी बाजार हिस्सेदारी (अनुमानित 4 करोड़ कुल पंजीकरणों में से 80 लाख ईवी के बराबर) हासिल करने से भारत को अपने कच्चे तेल के आयात बिल में ₹1 लाख करोड़ से अधिक की बचत होगी। इस क्षमता को अनलॉक करने के लिए, रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण नीतिगत हस्तक्षेपों का विवरण दिया गया है:
दीर्घकालिक ढांचा (लॉन्ग-टर्म फ्रेमवर्क): निरंतर औद्योगिक निवेश को सुरक्षित करने के लिए एक व्यापक 10-15 वर्षीय ईवी रोडमैप की घोषणा करना।
वित्तीय जोखिम कम करना (फाइनेंशियल डी-रिस्किंग): खुदरा (रिटेल) और वाणिज्यिक ऋण लागत को कम करने के लिए सरकार समर्थित 'ईवी क्रेडिट गारंटी फंड' का निर्माण करना।
ग्रिड का आधुनिकीकरण: बैटरी स्टोरेज, पंप्ड हाइड्रो सिस्टम और डिस्ट्रीब्यूटेड स्टोरेज नेटवर्क को बढ़ावा देकर भारत में शाम के समय होने वाली पीक बिजली किल्लत का समाधान करना, ताकि दिन के समय की अतिरिक्त सौर ऊर्जा को सुरक्षित रूप से गैर-सौर घंटों (रात के समय) में स्थानांतरित किया जा सके।
प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र का दर्जा (प्रायोरिटी सेक्टर स्टेटस): वाणिज्यिक बैंकिंग सहायता को तेजी से जुटाने के लिए ईवी फाइनेंसिंग को 'प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग' (PSL) के अंतर्गत वर्गीकृत करना या इसके लिए एक समर्पित ग्रीन मोबिलिटी फ्रेमवर्क तैयार करना।