कर्नाटक कांग्रेस इस समय बड़े राजनीतिक तनाव से गुजर रही है। पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान खुलकर सामने आ गई है। करीब 10 विधायक, जो उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के समर्थक माने जाते हैं, दिल्ली पहुंच चुके हैं और मांग कर रहे हैं कि अब शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाए।
विवाद की जड़ क्या है
पार्टी के अंदर लंबे समय से यह चर्चा चल रही है कि 2023 में सरकार बनने के समय एक "पावर-शेयरिंग फॉर्मूला" तय हुआ था। इसके मुताबिक सिद्धारमैया 2.5 साल तक मुख्यमंत्री रहेंगे और उसके बाद शिवकुमार को पद सौंपा जाएगा।
नवंबर उसी आधे कार्यकाल का समय माना जा रहा है, इसलिए शिवकुमार खेमे के नेता अब बदलाव की मांग उठा रहे हैं।
दोनों नेताओं की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इन अटकलों को "बिना वजह की बहस" बताया है। उन्होंने कहा कि वह अपने पद को लेकर पूरी तरह सुरक्षित हैं और मुख्यमंत्री बदलने का फैसला केवल पार्टी हाईकमान ही ले सकता है।
डी.के. शिवकुमार ने भी खुलकर पद की मांग नहीं की है, लेकिन उन्होंने कहा है कि जो भी फैसला होगा, हाईकमान करेगा और वह पार्टी के साथ हैं। लेकिन उनके समर्थकों की सक्रियता ने मामला गरमा दिया है।
पार्टी में बढ़ती दरार
इस खींचतान ने कर्नाटक कांग्रेस के अंदर गहरा असंतोष दिखा दिया है।
कुछ विधायकों ने तो यहां तक कहा है कि अगर न सिद्धारमैया और न ही शिवकुमार, तो राज्य के गृहमंत्री जी. परमेश्वर भी विकल्प हो सकते हैं। इससे साफ है कि पार्टी के भीतर भ्रम और असंतोष दोनों बढ़ रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद अगर जल्द नहीं सुलझा, तो सरकार की स्थिरता और कांग्रेस की छवि दोनों को नुकसान हो सकता है।
आगे क्या हो सकता है
सभी की नजरें अब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर हैं, जिनसे जल्द फैसला लेने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि 1 दिसंबर के आसपास, जब संसद सत्र शुरू होगा, तब तक कोई स्पष्ट कदम उठाया जा सकता है।
फिलहाल कांग्रेस की कर्नाटक सरकार अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है, और दोनों खेमों के बीच शक्ति-संग्राम लगातार बढ़ता जा रहा है।