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इक्कीस रिव्यू: भावनात्मक श्रद्धांजलि, लेकिन कुछ पलों में कहानी की पकड़ ढीली पड़ती है

इक्कीस रिव्यू: भावनात्मक श्रद्धांजलि, लेकिन कुछ पलों में कहानी की पकड़ ढीली पड़ती है

फिल्म इक्कीस परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन से प्रेरित एक बायोग्राफिकल वॉर ड्रामा है। निर्देशक श्रीराम राघवन ने इसे एक पारंपरिक युद्ध फिल्म की तरह नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और भावनात्मक कहानी के रूप में पेश किया है। फिल्म देशभक्ति के शोर से ज्यादा इंसानी भावनाओं और बलिदान की गहराई पर ध्यान देती है।

अगस्त्य नंदा ने अपने किरदार को सादगी और ईमानदारी से निभाया है। उनका अभिनय शांत है, लेकिन प्रभाव छोड़ता है। वह एक ऐसे युवा सैनिक को दर्शाते हैं जो जिम्मेदारी, कर्तव्य और साहस के बीच अपनी जगह बनाता है। वहीं धर्मेंद्र फिल्म की भावनात्मक रीढ़ बनकर उभरते हैं। उनकी मौजूदगी हर सीन को वजन देती है और कई जगह बिना संवाद के भी भावनाएं साफ झलकती हैं।

हालांकि फिल्म का इरादा साफ और नेक है, लेकिन इसकी कहानी कहने की रफ्तार हर जगह समान नहीं रहती। कुछ हिस्सों में नैरेशन और सीन ट्रांजिशन अचानक बदलते हैं, जिससे दर्शक थोड़ी देर के लिए कहानी से जुड़ाव खो सकते हैं। कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं, जबकि कुछ अहम पल बहुत जल्दी खत्म हो जाते हैं। यही वजह है कि फिल्म बीच-बीच में अपनी पकड़ थोड़ी ढीली करती महसूस होती है।

एडिटिंग और पेसिंग फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष कही जा सकती है। धीमी गति कई जगह भावनात्मक असर बढ़ाती है, लेकिन कुछ हिस्सों में यही धीमापन दर्शक को भटका भी सकता है — खासकर उन लोगों को जो तेज रफ्तार या एक्शन-प्रधान वॉर फिल्म की उम्मीद लेकर थिएटर जाते हैं।

दृश्यात्मक रूप से फिल्म संयमित है। युद्ध के दृश्य भव्यता के बजाय यथार्थ और माहौल पर केंद्रित हैं। यह फैसला फिल्म के भावनात्मक स्वर से मेल खाता है, हालांकि इससे एक्शन की तीव्रता सीमित हो जाती है।

इक्कीस की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह युद्ध को महज़ वीरता का प्रदर्शन नहीं बनाती, बल्कि उसके पीछे छिपे दर्द, त्याग और इंसानी कीमत को सामने लाती है। फिल्म शोरगुल भरे राष्ट्रवाद के बजाय संवेदनशीलता और आत्मचिंतन को महत्व देती है।

निष्कर्ष

इक्कीस एक ईमानदार और भावनात्मक श्रद्धांजलि है, जो अपने विषय के प्रति सम्मान दिखाती है। भले ही इसकी धीमी गति और असमान कहानी कहने का तरीका कुछ जगह दर्शकों को कहानी से दूर कर दे, लेकिन मजबूत अभिनय और भावनात्मक गहराई इसे असरदार बनाते हैं। जो दर्शक धैर्य के साथ फिल्म देखेंगे, उन्हें इसमें कई सच्चे और भावुक पल मिलेंगे।

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