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मणिपाल हॉस्पिटल्स, ढाकुरिया में फटे हुए ब्रेन एन्यूरिज़्म से पीड़ित ४२ वर्षीय मरीज का सफल उपचार

मणिपाल हॉस्पिटल्स, ढाकुरिया में फटे हुए ब्रेन एन्यूरिज़्म से पीड़ित ४२ वर्षीय मरीज का सफल उपचार

कोलकाता: मणिपाल हॉस्पिटल्स, ढाकुरिया की न्यूरोसर्जरी टीम ने बिहार के ४२ वर्षीय किसान श्री रमेश कुमार (बदला हुआ नाम) का सफलतापूर्वक इलाज किया। मरीज को मस्तिष्क की एक रक्तवाहिका फटने के कारण जानलेवा रक्तस्राव हुआ था। यह स्थिति एंटीरियर कम्युनिकेटिंग आर्टरी (एसीओएम) एन्यूरिज़्म के फटने से उत्पन्न हुई थी। एसीओएम मस्तिष्क के अगले हिस्से को रक्त पहुँचाने वाली दो प्रमुख धमनियों को जोड़ने वाली रक्तवाहिका है। इसमें कमजोरी के कारण गुब्बारे जैसी सूजन हो सकती है। मरीज को शुरुआत में तेज सिरदर्द, बार-बार उल्टी और उनींदापन की शिकायत थी। जाँच में एन्यूरिज़्म के फटने से मस्तिष्क के आसपास रक्तस्राव की पुष्टि हुई, जिसे चिकित्सकीय भाषा में एन्यूरिज़्मल सबअरेक्नॉइड हैमरेज (एसएएच) कहा जाता है। स्थिति की गंभीरता और दोबारा रक्तस्राव के जोखिम को देखते हुए, मणिपाल हॉस्पिटल्स, ढाकुरिया के कंसल्टेंट - न्यूरोसर्जरी, डॉ. निरुप दत्ता के नेतृत्व में टीम ने एन्यूरिज़्म को सुरक्षित करने के लिए तत्काल सर्जरी करने का निर्णय लिया।

श्री रमेश को पहले कभी ब्रेन एन्यूरिज़्म का पता नहीं चला था। यह ऐसी स्थिति है, जो कई वर्षों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रह सकती है। कंप्यूटेड टोमोग्राफी (सीटी) स्कैन से मस्तिष्क के आसपास रक्तस्राव की पुष्टि हुई। इसके बाद की गई डिजिटल सब्ट्रैक्शन एंजियोग्राफी (डीएसए) नामक विशेष जाँच में एंटीरियर कम्युनिकेटिंग आर्टरी में लगभग ८.९ × ३ मिलीमीटर आकार का जटिल और चौड़ी गर्दन वाला एन्यूरिज़्म सामने आया। एन्यूरिज़्म के साथ बाईं ओर का ए१ सेगमेंट भी सामान्य से छोटा था। इसका अर्थ था कि उस क्षेत्र में रक्त पहुँचाने वाली एक रक्तवाहिका अपेक्षाकृत छोटी थी। इस जटिल बनावट के कारण सर्जरी अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई और सावधानीपूर्वक योजना बनाना आवश्यक था।

ब्रेन एन्यूरिज़्म रक्तवाहिका की दीवार में होने वाली गुब्बारे जैसी कमजोर सूजन है, जो फटने तक बिना लक्षणों के रह सकती है। इसके फटने पर मस्तिष्क के आसपास रक्तस्राव हो सकता है और स्थिति जानलेवा बन सकती है। पहली बार रक्तस्राव होने के बाद शुरुआती ४८-९६ घंटों के दौरान दोबारा रक्तस्राव का खतरा विशेष रूप से अधिक रहता है। दूसरी बार रक्तस्राव होने पर मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुँच सकती है और मरीज की मृत्यु भी हो सकती है। इलाज कर रहे डॉक्टर के अनुसार, लगभग ५०-७० प्रतिशत मरीज दूसरे रक्तस्राव के बाद जीवित नहीं बच पाते। इसलिए एन्यूरिज़्म के फटने पर जल्द से जल्द इलाज करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा, एन्यूरिज़्म फटने से वासोस्पाज़्म जैसी जटिलताएँ भी हो सकती हैं। इसमें रक्तवाहिकाएँ संकरी हो जाती हैं, जिससे मस्तिष्क तक रक्त का प्रवाह कम हो सकता है और दोबारा स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।

डॉक्टरों ने फटे हुए एन्यूरिज़्म को सुरक्षित करने और दोबारा रक्तस्राव रोकने के लिए माइक्रोसर्जिकल क्लिपिंग नामक विशेष प्रक्रिया की। मरीज की लेफ्ट टेरियोनल क्रैनियोटॉमी की गई। इस सर्जिकल तकनीक में मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से तक पहुँचने के लिए खोपड़ी का एक छोटा हिस्सा खोला जाता है। इसके बाद एन्यूरिज़्म की सावधानीपूर्वक पहचान कर उस पर क्लिप लगाई गई, ताकि रक्त कमजोर हिस्से में प्रवेश न कर सके। ब्रेन एन्यूरिज़्म के इलाज में सर्जिकल क्लिपिंग और एंडोवैस्कुलर कोइलिंग, दोनों स्थापित उपचार पद्धतियाँ हैं। इनमें से किस पद्धति को चुना जाए, यह मरीज की स्थिति तथा एन्यूरिज़्म के आकार, स्थान और बनावट पर निर्भर करता है। इस मामले में एन्यूरिज़्म की विशेष बनावट और मरीज की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सर्जिकल क्लिपिंग का विकल्प चुना गया।

सर्जरी में असाधारण सटीकता की आवश्यकता थी, क्योंकि एन्यूरिज़्म मस्तिष्क के संवेदनशील हिस्से में स्थित था और उसकी गर्दन चौड़ी होने के साथ रक्तवाहिकाओं की बनावट भी जटिल थी। प्रक्रिया के बाद मरीज को गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू)/उच्च निर्भरता इकाई (एचडीयू) में करीबी निगरानी में रखा गया। नियमित अंतराल पर न्यूरोलॉजिकल जाँच और बार-बार इमेजिंग की गई। सर्जरी के बाद के स्कैन में मस्तिष्क में कुछ रक्तस्राव और सूजन, स्ट्रोक का एक छोटा क्षेत्र तथा मस्तिष्क की बाहरी झिल्ली के नीचे रक्त जमा होने की पुष्टि हुई। हालांकि, व्यापक चिकित्सा प्रबंधन और करीबी न्यूरोलॉजिकल निगरानी के साथ मरीज की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ और वह स्वतंत्र रूप से चलने-फिरने की दिशा में आगे बढ़ा।

इस मामले के बारे में बताते हुए, मणिपाल हॉस्पिटल्स, ढाकुरिया के कंसल्टेंट - न्यूरोसर्जरी, डॉ. निरुप दत्ता ने कहा, “ब्रेन एन्यूरिज़्म का फटना एक जानलेवा आपातकालीन स्थिति है, जिसमें समय पर उपचार बेहद महत्वपूर्ण होता है। शुरुआती ४८-९६ घंटों के दौरान दोबारा रक्तस्राव का खतरा विशेष रूप से अधिक रहता है और दूसरी बार रक्तस्राव होने पर गंभीर, यहाँ तक कि जानलेवा परिणाम भी हो सकते हैं। इस मामले में एन्यूरिज़्म की बनावट जटिल थी। उसकी गर्दन चौड़ी थी और ए१ सेगमेंट सामान्य से छोटा था, जिससे सर्जरी तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण हो गई। हमारी प्राथमिकता जल्द से जल्द एन्यूरिज़्म को सुरक्षित करना और आगे रक्तस्राव को रोकना था। सावधानीपूर्वक माइक्रोसर्जिकल क्लिपिंग, सर्जरी के बाद करीबी निगरानी और व्यापक चिकित्सा देखभाल के माध्यम से मरीज की गंभीर स्थिति के बावजूद उसके स्वास्थ्य में संतोषजनक सुधार हुआ है।

फटे हुए एन्यूरिज़्म के चेतावनी संकेतों को पहचानना भी बेहद जरूरी है। अचानक होने वाला असहनीय सिरदर्द, जिसे अक्सर ‘थंडरक्लैप हेडेक’ कहा जाता है, विशेष रूप से उल्टी, बेहोशी या दौरे के साथ होने पर कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। शुरुआती पहचान और समय पर उपचार दोबारा रक्तस्राव तथा गंभीर न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।”

श्री रमेश का सफल उपचार जटिल और फटे हुए ब्रेन एन्यूरिज़्म के प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मामला जानलेवा न्यूरोलॉजिकल आपातकालीन स्थितियों में शुरुआती निदान, समय पर सर्जरी, विशेषज्ञ न्यूरोसर्जिकल देखभाल और सर्जरी के बाद व्यापक चिकित्सा प्रबंधन के महत्व को रेखांकित करता है।

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