अमेरिका की एक फेडरल कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू की गई $100,000 (करीब 83 लाख रुपये) की H-1B वीज़ा फ़ीस को बरकरार रखने का फैसला सुनाया है। इसका मतलब है कि फिलहाल यह ऊँची फ़ीस लागू रहेगी।
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब कई बिज़नेस संगठनों ने इस फ़ीस को चुनौती दी थी और कहा था कि यह नियम विदेशी टैलेंट को नौकरी देने वाली कंपनियों पर भारी बोझ डालेगा।
नई H-1B वीज़ा फ़ीस क्या है?
सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीज़ा नियमों में बड़ा बदलाव किया था। इसके तहत, किसी विदेशी प्रोफेशनल के लिए नया H-1B वीज़ा आवेदन करने पर नियोक्ता को एक बार में $100,000 की फ़ीस देनी होगी।
इससे पहले H-1B वीज़ा के लिए कुल फ़ीस कुछ हज़ार डॉलर ही होती थी। H-1B वीज़ा का इस्तेमाल अमेरिकी कंपनियां टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, साइंस और मेडिकल जैसे क्षेत्रों में कुशल विदेशी कर्मचारियों को रखने के लिए करती हैं।
कोर्ट ने फ़ीस को क्यों सही ठहराया?
24 दिसंबर 2025 को अमेरिकी जज ने कहा कि सरकार के पास यह अधिकार है कि वह इमिग्रेशन फ़ीस में बदलाव करे, भले ही वह फ़ीस पहले से कहीं ज़्यादा क्यों न हो।
यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स और अन्य व्यापार संगठनों ने अदालत में दलील दी थी कि इतनी ज़्यादा फ़ीस से छोटी और मध्यम कंपनियां विदेशी टैलेंट को हायर नहीं कर पाएंगी। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
कंपनियों और कर्मचारियों पर असर
इस फैसले से कई अमेरिकी कंपनियां परेशान हैं, खासकर टेक सेक्टर की कंपनियां जो बड़ी संख्या में H-1B वीज़ा पर कर्मचारियों को रखती हैं।
आलोचकों का कहना है कि इतनी ज़्यादा फ़ीस से:
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विदेशी प्रोफेशनल्स को नौकरी देना महंगा हो जाएगा
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इनोवेशन और टेक्नोलॉजी ग्रोथ पर असर पड़ सकता है
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भारतीय और अन्य देशों के आईटी प्रोफेशनल्स के लिए मौके कम हो सकते हैं
सरकार का तर्क क्या है?
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह फ़ीस अमेरिकी नौकरियों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है। सरकार का मानना है कि इससे कंपनियां पहले अमेरिकी नागरिकों को नौकरी देने पर ध्यान देंगी और सिर्फ ज़रूरत पड़ने पर ही विदेशी कर्मचारियों को हायर करेंगी।
H-1B सिस्टम में अन्य बदलाव
इस फ़ीस के अलावा, अमेरिका ने H-1B वीज़ा के लॉटरी सिस्टम को भी खत्म करने का ऐलान किया है। अब वीज़ा चयन में ज़्यादा सैलरी और ज़्यादा स्किल्स वाले आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इससे वीज़ा प्रक्रिया और ज़्यादा जटिल हो सकती है।
आगे क्या होगा?
भले ही फिलहाल कोर्ट ने फ़ीस को मंज़ूरी दे दी है, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। व्यापार संगठन इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील कर सकते हैं।
तब तक, विदेशी कर्मचारियों और कंपनियों दोनों को नए और सख्त H-1B नियमों के साथ आगे बढ़ना होगा।