मुंबई : सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का बढ़ता उपयोग भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हुआ है, जिससे गैर-कृषि अनिगमित उद्यमों (unincorporated enterprises) की श्रम उत्पादकता (labor productivity) में 76% की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की नवीनतम रिसर्च रिपोर्ट (इश्यू #06, वित्त वर्ष 27) के अनुसार, 'एनुअल सर्वे ऑफ अनइनकॉर्पोरेटेड सेक्टर एंटरप्राइजेज' (ASUSE 2025) के यूनिट-लेवल डेटा विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि डिजिटल तकनीक देश के जमीनी कारोबारी ढांचे में कार्यकुशलता और औपचारिकता (formalization) दोनों को तेजी से बढ़ावा दे रही है।
रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि स्मार्टफोन, डिजिटल भुगतान और अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर जैसे टूल्स अपनाने से न केवल उत्पादकता बढ़ती है, बल्कि व्यावसायिक जटिलताएं भी कम होती हैं। डिजिटल माध्यमों को अपनाने से किसी फर्म के पंजीकरण (registration) की संभावना औसतन 84 प्रतिशत अंक तक बढ़ जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों की बात करें तो, आईसीटी अपनाने के कारण विनिर्माण (manufacturing) में पंजीकरण की संभावना 64 प्रतिशत अंक, व्यापार (trade) में 82 प्रतिशत अंक और अन्य सेवाओं (other services) में 86 प्रतिशत अंक तक बढ़ जाती है। यह दिखाता है कि डिजिटल रूप से सक्षम सेवा प्रदाता बेहद तेजी से औपचारिक संस्थागत ढांचे में शामिल हो रहे हैं।
इस अध्ययन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष उद्यमों के पंजीकरण और उन्हें मिलने वाले संस्थागत लोन (institutional credit) के बीच सीधा संबंध दिखाता है। गैर-पंजीकृत उद्यमों की तुलना में पंजीकृत उद्यमों को औपचारिक लोन मिलने की संभावना 6.90 प्रतिशत अंक अधिक होती है। ऋण की राशि में भी यह अंतर साफ नजर आता है; जहाँ एक गैर-पंजीकृत उद्यम को औसतन केवल ~₹75,000 का लोन मिल पाता है, वहीं पंजीकृत उद्यमों के लिए यह औसत ऋण राशि बढ़कर ~₹5 लाख हो जाती है। सरकारी पंजीकरण प्रणालियों का प्रभाव भी स्पष्ट है; फॉर्मलाइजेशन स्कोर के मामले में उद्यम असिस्ट (Udyam Assist) से जुड़े उद्यम सबसे आगे (15.92 अंक) हैं, जिसके बाद उद्यम (15.45 अंक) और जीएसटी (13.51 अंक) का स्थान आता है। यह पहचान सीधे तौर पर बड़े लोन में बदलती है, जहाँ उद्यम और उद्यम असिस्ट के तहत आने वाली फर्में लगभग ₹10 लाख तक की औसत ऋण राशि प्राप्त करने में सफल रहती हैं।
अनुसंधान में महिला सशक्तिकरण को लेकर भी सकारात्मक रुझान सामने आए हैं, जिसके तहत महिला-स्वामित्व वाले एकल उद्यमों (proprietary establishments) की हिस्सेदारी वर्ष 2022-23 के 23% से लगातार बढ़कर वर्ष 2025 में 27% तक पहुंच गई है। हालांकि सामान्य तौर पर पुरुष प्रोप्राइटरों की तुलना में महिला प्रोप्राइटरों को औपचारिक ऋण मिलने की संभावना 2.44% कम आंकी गई है, लेकिन औपचारिक पंजीकरण इस खाई को पाटने का काम करता है। पंजीकृत महिला प्रोप्राइटरों को संस्थागत लोन मिलने की संभावना 5.6% अधिक हो जाती है, जिससे उनकी औसत ऋण राशि ₹75,000 (गैर-पंजीकृत होने पर) से बढ़कर सीधे ~₹5 लाख तक पहुंच जाती है।
इस सकारात्मक बदलाव की गति को बनाए रखने के लिए, आर्थिक अनुसंधान टीम ने सरकार के लिए एक रणनीतिक रोडमैप का सुझाव दिया है। प्रमुख सिफारिशों में आईसीटी तकनीकों को किफायती बनाना, उद्यम-पंजीकृत फर्मों के लिए एक औपचारिक स्कोरकार्ड तैयार करना, सूक्ष्म इकाइयों के लिए अनुपालन लागत (compliance costs) को कम करना और पारंपरिक कोलैटरल (गारंटी) के बजाय डिजिटल लेनदेन के इतिहास पर आधारित 'कैश इनफ्लो-बेस्ड लेंडिंग' को बढ़ावा देना शामिल है।