भारत में बहुत से बच्चे स्कूलों में मानसिक तनाव और भावनात्मक दिक्कतों से जूझ रहे हैं, लेकिन स्कूल सिस्टम उन्हें सही मदद नहीं दे पा रहा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में शर्म, स्कूलों में काउंसलर्स की कमी और कमजोर नीतियां स्थिति को और खराब बना रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी छात्र आत्महत्याओं को “सिस्टम की असफलता” कहा है और सभी स्कूलों व कोचिंग संस्थानों में प्रशिक्षित काउंसलर्स रखने, स्टाफ को मानसिक स्वास्थ्य की ट्रेनिंग देने और छात्रों के लिए सुरक्षित शिकायत व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए हैं।
ज्यादातर स्कूलों में बच्चों को अपनी भावनाएं समझने, तनाव या चिंता से निपटने की शिक्षा नहीं दी जाती। कक्षाओं में भावनात्मक शिक्षा की बजाय सिर्फ पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान रहता है।
क्या चीजें सुधार में बाधा बन रही हैं
1. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भारी कमी
भारत में प्रशिक्षित चाइल्ड साइकॉलजिस्ट और स्कूल काउंसलर्स बहुत कम हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों में।
2. मानसिक स्वास्थ्य को लेकर शर्म और गलत सोच
बहुत से माता-पिता और शिक्षक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को “बुरा व्यवहार” मानते हैं। यही वजह है कि बच्चे अपनी परेशानी बताने से डरते हैं।
3. स्कूलों में सही संसाधनों की कमी
कई स्कूलों में काउंसलिंग के लिए निजी, शांत और सुरक्षित जगह नहीं होती। काउंसलर्स पर अतिरिक्त प्रशासनिक काम भी डाल दिया जाता है, जिससे गोपनीयता खत्म हो जाती है।
4. कमजोर ट्रेनिंग और गाइडलाइंस
शिक्षक यह पहचान नहीं पाते कि बच्चा मानसिक तनाव से गुजर रहा है। स्पष्ट नियम न होने से कई गंभीर संकेत नजरअंदाज हो जाते हैं।
उम्मीद की किरण: क्या चीजें बेहतर हो रही हैं
-
आंध्र प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 255 प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य और करियर काउंसलर्स की नियुक्ति की गई है।
-
दिल्ली के कुछ स्कूल आर्ट थेरेपी, निजी काउंसलिंग सेशन और मोबाइल मानसिक स्वास्थ्य वैन जैसी सुविधाएं दे रहे हैं।
-
मानस फाउंडेशन विभिन्न स्कूलों में शिक्षकों और काउंसलर्स को भावनात्मक समर्थन की ट्रेनिंग दे रहा है।
-
कई स्कूलों ने लाइफ स्किल्स और इमोशनल एजुकेशन को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना शुरू किया है।
आगे क्या किया जाना चाहिए: समाधान का रास्ता
हर स्कूल में निश्चित संख्या में काउंसलर्स नियुक्त हों
छात्रों की संख्या के अनुसार पर्याप्त प्रशिक्षित काउंसलर्स जरूरी हैं।
शिक्षकों की ट्रेनिंग मजबूत की जाए
ताकि वे तनाव, चिंता या उदासी के शुरुआती संकेत पहचान सकें।
गोपनीय और सुरक्षित रिपोर्टिंग सिस्टम बनाया जाए
ताकि बच्चे बिना किसी डर के अपनी बात बता सकें।
भावनात्मक शिक्षा को पढ़ाई का हिस्सा बनाया जाए
बच्चों को अपनी भावनाएं समझना और संभालना सिखाया जाए।
स्कूलों को मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित बजट दिया जाए
काउंसलिंग रूम, जागरूकता कार्यक्रम और नियमित ट्रेनिंग के लिए फंड जरूरी है।
मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात हो
असेंबली, PTM और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए शर्म और डर को कम किया जा सकता है।
क्यों यह सब बेहद जरूरी है
अगर स्कूल मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो हम कई युवा जीवन तनाव, चिंता और आत्महत्या जैसे कारणों से खो देंगे।
लेकिन अगर स्कूल सुरक्षित माहौल, प्रशिक्षित काउंसलर्स और मजबूत सपोर्ट सिस्टम दें, तो वे बच्चों के भावनात्मक और सामाजिक विकास के सबसे महत्वपूर्ण स्थान बन सकते हैं।
बच्चों को एक ऐसा माहौल चाहिए जहाँ उन्हें समझा जाए, सुना जाए और सुरक्षित महसूस हो — और यह जिम्मेदारी स्कूलों की है।