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वर्ष 2047 तक भारत को 450 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन करना होगा; उर्वरक क्षेत्र के कायाकल्प के लिए आईसीटी और ब्लॉकचेन महत्वपूर्ण: एफएआई महानिदेशक

वर्ष 2047 तक भारत को 450 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन करना होगा; उर्वरक क्षेत्र के कायाकल्प के लिए आईसीटी और ब्लॉकचेन महत्वपूर्ण: एफएआई महानिदेशक
  • एफएआई (FAI) के महानिदेशक डॉ. एस. के. चौधरी का कहना है कि भारत को वर्ष 2030 तक 400 मिलियन टन से अधिक और वर्ष 2047 तक 450 मिलियन टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी, जिससे आईसीटी-संचालित कृषि दक्षता एक राष्ट्रीय अनिवार्यता बन जाएगी

  • डॉ. चौधरी ने एक युगांतकारी बदलाव का आह्वान किया: उर्वरक उद्योग का लक्ष्य केवल किसान नहीं, बल्कि पौधे की जड़ होना चाहिए; यह नया दृष्टिकोण उर्वरक नवाचार की अगली लहर का मार्ग प्रशस्त करेगा

  • बंदरगाह से लेकर खेत तक उर्वरक की एंड-टू-एंड ट्रैकिंग (traceability) और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ब्लॉकचेन तकनीक को एक परिवर्तनकारी उपकरण के रूप में रेखांकित किया गया

नई दिल्ली : द फर्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (FAI) के महानिदेशक, डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने कहा है कि भारत को वर्ष 2030 तक 400 मिलियन टन से अधिक और वर्ष 2047 तक, जब देश अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा, लगभग 450 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन करने की आवश्यकता होगी। ऐसे में कृषि और उर्वरक क्षेत्र में तकनीक का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया है। वे हिमाचल प्रदेश के स्टर्लिंग रिसॉर्ट कुफरी में 'स्मार्ट फर्टिलाइज़र मैनेजमेंट के लिए आईसीटी' पर एफएआई के चार दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्घाटन के अवसर पर बोल रहे थे।

डॉ. चौधरी ने इस बात पर जोर दिया कि उर्वरक उद्योग को अपने उद्देश्य के प्रति अपनी सोच में एक मौलिक बदलाव लाने की जरूरत है। उन्होंने कहा, "हमारा लक्ष्य किसान नहीं है, हमारा लक्ष्य पौधे की जड़ है।" उन्होंने आगे कहा कि जब उद्योग पौधे की जड़ तक सही समय पर, सही स्थान पर और सही मात्रा में सही पोषक तत्व पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित करेगा, तो यह सटीक पोषण (precision nutrition), सेंसर-आधारित वितरण और विशिष्ट उर्वरक फॉर्मूलेशन के क्षेत्र में नवाचारों की एक पूरी नई श्रेणी के द्वार खोल देगा। उन्होंने उल्लेख किया कि वैदिक काल से चले आ रहे अपने गहरे कृषि ज्ञान के आधार के साथ भारत वैश्विक स्तर पर इस विमर्श का नेतृत्व करने के लिए एक विशिष्ट स्थिति में है। उन्होंने प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, संरक्षण कृषि और पुनर्योजी (regenerative) कृषि को ऐसे ढांचे के रूप में रेखांकित किया जिसे भारत दुनिया के सामने पेश कर सकता है।

डिजिटल उपकरणों की परिवर्तनकारी क्षमता पर बात करते हुए, डॉ. चौधरी ने विशेष रूप से ब्लॉकचेन को एक ऐसी तकनीक के रूप में उजागर किया जो उर्वरक क्षेत्र के लॉजिस्टिक्स और गवर्नेंस का कायाकल्प करने में सक्षम है, जिससे आयात-बंदरगाह (port-of-entry) से लेकर किसान के खेत तक पूर्ण ट्रैकिंग और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि जब आईसीटी (Information and Communication Technology - ICT) को उत्पादन योजना और संयंत्रों में जोखिम प्रबंधन से लेकर आपूर्ति श्रृंखला अनुकूलन, रिमोट सेंसिंग, जीआईएस-आधारित मृदा मानचित्रण (soil mapping), उपग्रह इमेजरी और एआई-संचालित परामर्श प्रणालियों तक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला (value chain) में लागू किया जाता है, तो यह ऊर्जा दक्षता, नीति अनुपालन और कृषि उत्पादकता में महत्वपूर्ण सुधार ला सकता है।

कुफरी में आयोजित इस चार दिवसीय कार्यक्रम को उर्वरक और कृषि क्षेत्रों में आईसीटी के अनुप्रयोगों के पूरे दायरे को कवर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसमें लॉजिस्टिक्स के लिए ब्लॉकचेन, आपूर्ति और मांग के पूर्वानुमान के लिए प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स, मिट्टी व फसल की निगरानी के लिए आईओटी (IoT) और सेंसर नेटवर्क, प्रिसिजन एग्रीकल्चर (सटीक कृषि) और 'ब्लू ओशन स्ट्रैटेजी' में डिजिटल तकनीक की भूमिका शामिल है। इस कार्यक्रम में अग्रणी उर्वरक और कृषि-इनपुट संगठनों के उत्पादन, आपूर्ति श्रृंखला, विपणन, वित्त और कृषि-सेवा कार्यों से जुड़े प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं, जबकि संकाय (faculty) के रूप में उद्योग जगत, आईसीएआर (ICAR) संस्थानों, एग्री-टेक स्टार्टअप्स और कंसलटेंसी संगठनों के विशेषज्ञ शामिल हैं।

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