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जब फ्लाइंग बीस्ट बिज़नेस लेकर आए, तो शार्क्स ने सवाल क्रिएटर पर क्यों दागे?

जब फ्लाइंग बीस्ट बिज़नेस लेकर आए, तो शार्क्स ने सवाल क्रिएटर पर क्यों दागे?

जब फ्लाइंग बीस्ट (गौरव तनेजा) BeastLife का पिच लेकर शार्क टैंक इंडिया के सेट पर पहुंचे, उन्हें उम्मीद थी कि सवाल होंगे—
valuation, revenue, customer retention, CAC, repeat orders और supply chain पर।

लेकिन मिला कुछ और ही।

शार्क्स ने कंपनी पर नहीं, उनकी YouTube लाइफ, क्रिएटर पहचान, पर्सनल लाइफ और लाइफस्टाइल पर सवालों की बौछार कर दी।
और यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है:
क्या हम देश के टॉप निवेशकों से यही उम्मीद करते हैं?

उनकी क्रिएटर पहचान को ‘कमज़ोरी’ क्यों बना दिया गया?

आज influence ही बिज़नेस की सबसे बड़ी ताकत है।
Audience = Distribution
Distribution = Free Marketing

फ्लाइंग बीस्ट के पास वह है जो अधिकांश स्टार्टअप सिर्फ सपना देखते हैं—
एक बड़ी, वफादार, instantly converting audience।
यह ताकत होनी चाहिए थी, मुसीबत नहीं।

लेकिन शार्क्स ने बार-बार पूछा—
“YouTube बंद क्यों नहीं कर देते?”,
“क्या आप सीरियस हैं?”,
“दोनो संभाल लोगे?”

सोचिए—
क्या वे यही सवाल एक क्रिकेटर से पूछते कि ब्रांड चलाने से पहले क्रिकेट छोड़ दो?
क्या वे एक एक्टर से कहते कि कंपनी बनाने से पहले फिल्में बंद कर दो?

तो फिर क्रिएटर को अलग नज़र से क्यों देखा जा रहा है?


बिज़नेस मीटिंग में पर्सनल लाइफ का चार्जशीट क्यों खोला गया?

एक pitch का मकसद होता है—
product, numbers, strategy और scalability समझना।

लेकिन यहाँ सवाल चले—

  • उनकी content career पर

  • उनकी social media presence पर

  • उनकी YouTube growth पर

  • उनकी personal earning पर

इनमें से एक भी सवाल BeastLife के बिज़नेस मॉडल से जुड़ा नहीं था।

और मज़ेदार बात?
जब “Nish Hair” जैसे सेलेब्रिटी फाउंडर्स आते हैं, तब कभी ऐसे पर्सनल सवाल नहीं पूछे जाते।


क्रिएटर्स को भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना किसी भी उद्यमी को

फ्लाइंग बीस्ट ने यह साबित किया है कि क्रिएटर सिर्फ वीडियो नहीं बनाते—वे
ब्रांड बनाते हैं, इकोसिस्टम बनाते हैं, कम्युनिटी बनाते हैं।

उन्होंने—

  • भारत की सबसे एंगेज्ड YouTube कम्युनिटीज़ में एक बनाई

  • प्रोडक्ट बनाने से पहले demand तैयार की

  • लॉन्च के कुछ घंटों में प्रोडक्ट sold out कराया

  • बिना VC पैसे के कंपनी बनाई

फिर भी शार्क्स का रवैया ऐसा था जैसे—
क्रिएटर होना = सीरियस न होना।

यह सोच अब पुरानी पड़ चुकी है।


असल सवाल तो पूछे ही नहीं गए

वे पूछ सकते थे—

  • CAC कितना है?

  • margin structure क्या है?

  • formulation clinically tested है?

  • competition कैसे tackle होगा?

  • brand founder-dependent कैसे नहीं रहेगा?

लेकिन उनकी नज़र बिज़नेस पर नहीं,
बिज़नेस चलाने वाले क्रिएटर पर थी।


कड़वी सच्चाई:

कुछ शार्क्स को लगता है कि क्रिएटर इकॉनमी उनसे तेज़ भाग रही है।

क्यों?

क्योंकि क्रिएटर एक वीडियो में वो कर देते हैं
जिसमें पारंपरिक ब्रांड्स करोड़ों फूंकते हैं।

क्योंकि क्रिएटर को scale करने के लिए investors की नहीं,
audience की ज़रूरत होती है।

क्योंकि क्रिएटर के पास वो power है
जो पुराने बिज़नेस प्ले-बुक में लिखा ही नहीं है।

और यही असहजता उनकी प्रतिक्रिया में दिखी।


अंतिम बात

फ्लाइंग बीस्ट शार्क टैंक अपनी पर्सनल लाइफ समझाने नहीं गए थे—
वे अपनी कंपनी लेकर गए थे।

उन्हें जज किया जाना चाहिए था—
उनके बनाए बिज़नेस पर, न कि उनके बनाए कंटेंट पर।

अगर Shark Tank India को भविष्य में प्रासंगिक रहना है,
तो उसे बदलना होगा।

क्रिएटर्स "side-hustlers" नहीं हैं—
वे नए दौर के उद्यमी हैं।

उन्हें वही सम्मान, वही गंभीरता और वही क्वालिटी वाले सवाल मिलने चाहिए
जो किसी भी फाउंडर को मिलते हैं।

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